क्या हम 'No Country for Old Men' की ओर बढ़ रहे हैं?
वर्ष 2007 में आई एक फिल्म, No Country for Old Men ने न केवल ऑस्कर की चार मुख्य श्रेणियों में अपनी जीत दर्ज की, बल्कि सिनेमाई जगत में एक नई बहस को भी जन्म दिया। यह फिल्म कोएन ब्रदर्स द्वारा निर्देशित थी और कोर्मैक मैकार्थी के उपन्यास पर आधारित थी। कहने को तो यह हिंसा, ड्रग सौदे और एक ठंडे दिमाग वाले हत्यारे की कहानी थी, लेकिन इसके अंतर्निहित संदेश कहीं अधिक गहरे थे।
आज जब हम वैश्विक स्वास्थ्य संकटों और महामारी के दौर से गुजर रहे हैं, तो इस फिल्म का शीर्षक हमारे मस्तिष्क में बार-बार कौंधता है। जिस तरह कोरोना महामारी ने पूरे विश्व को अपनी चपेट में लिया, उसने हमारे सामाजिक ढांचे की उन दरारों को उजागर कर दिया जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। भारत में जब संक्रमित मरीजों का आंकड़ा तेजी से बढ़ा, तो सवाल सिर्फ चिकित्सा सुविधाओं का नहीं था, बल्कि उस "नैतिक सुरक्षा तंत्र" का भी था जिसे हमने अपने बुजुर्गों के लिए बनाया था।
महामारी: एक अदृश्य हत्यारा
फिल्म में एंटन चिगुर (Anton Chigurh) का किरदार एक ऐसी अपरिहार्य शक्ति (unstoppable force) का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे कोई समझौता संभव नहीं है। वह भाग्य का फैसला एक सिक्के के उछाल से करता है। कुछ ऐसा ही अनुभव विश्व ने महामारी के दौरान किया। यह एक ऐसा अदृश्य शत्रु था जो न तो अमीर-गरीब के बीच भेद करता था और न ही सीमाओं को पहचानता था।
भारत जैसे विशाल देश में संक्रमण की गति ने कई सवाल खड़े किए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्टों के अनुसार, यदि समय रहते सख्त कदम और लॉकडाउन जैसे उपाय न अपनाए जाते, तो मानवीय क्षति का आंकड़ा अकल्पनीय होता। अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी जब मृत्यु दर ने रिकॉर्ड तोड़े, तो यह साफ हो गया कि विज्ञान के पास भी सीमाओं की अपनी दीवारें हैं। किसी भी वैक्सीन या दवा को अंतिम स्वीकृति मिलने से पहले कई जटिल परीक्षणों से गुजरना पड़ता है, और वह 'प्रतीक्षा काल' ही मानवता की सबसे बड़ी परीक्षा होती है।
भारतीय महानगर और 'तालाब' की अवधारणा
भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है, लेकिन पेट की भूख उसे महानगरों की संकरी गलियों में ले आती है। हमारे शहर औद्योगिक रूप से तो विकसित हुए, लेकिन सामाजिक रूप से संकुचित रह गए। एक ही कमरे में रहने वाले दस लोग 'सोशल डिस्टेंसिंग' जैसे शब्दों का पालन कैसे करते? महानगरों में जनसंख्या घनत्व उम्मीद से तीस गुना अधिक होने के कारण संक्रमण का प्रसार जंगल की आग की तरह हुआ।
यहाँ एक बहुत ही सटीक उपमा दी जा सकती है—तालाब और मछली की। एक स्वस्थ तालाब वही होता है जिसका पानी स्थिर हो और जहाँ की मछलियाँ दूसरे दूषित तालाबों में न जाएँ। सरकारों का प्रयास भी यही होना चाहिए था कि पूरे देश को छोटे-छोटे सुरक्षित 'तालाबों' (Micro-zones) में विभाजित कर दिया जाए। यदि मछलियों (आम जनता) का उचित ध्यान उसी तालाब में रखा जाता, तो उन्हें पलायन की पीड़ा और संक्रमण का खतरा दोनों नहीं झेलने पड़ते।
क्या यह देश अब बुजुर्गों के लिए नहीं है?
फिल्म का शीर्षक—No Country for Old Men—एक पुरानी आयरिश कविता 'Sailing to Byzantium' से प्रेरित है। इसका मूल अर्थ यह है कि एक ऐसी दुनिया जो केवल युवाओं और गति की पूजा करती है, वहां अनुभव और वृद्धावस्था के लिए कोई जगह नहीं बचती। महामारी के दौरान भी हमने देखा कि जिनकी 'रोग प्रतिरोधक क्षमता' (Immunity) कमजोर थी या जो वृद्ध थे, वे सबसे अधिक असुरक्षित रहे।
आज बहुत से लोग आर्थिक कारणों से लॉकडाउन हटाने की मांग करते हैं, लेकिन हमें खुद से पूछना होगा—उनका क्या जो हमारे पूर्वज हैं? क्या हम एक ऐसे निर्दयी समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ केवल 'सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट' ही एकमात्र कानून है? यदि हम अपने बुजुर्गों को सुरक्षा नहीं दे सकते, तो हम वास्तव में उसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जिसकी ओर फिल्म इशारा करती है।
निष्कर्ष: आत्ममंथन की आवश्यकता
महामारी का आना केवल एक स्वास्थ्य आपदा नहीं थी, बल्कि यह एक सामाजिक दर्पण था। इसने हमें दिखाया कि "ना हम तैयार थे, ना सरकार तैयार थी।" सौ साल बाद आई इस तरह की त्रासदी ने हमें यह सिखाया है कि आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर जब हम सामूहिक रूप से कार्य करते हैं, तभी सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं।
हमें अपने स्वास्थ्य ढांचे को केवल मशीनों और दवाइयों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे इतना मानवीय बनाना होगा कि अगली बार जब कोई संकट आए, तो समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति भी यह महसूस करे कि यह देश और यह समाज उसके लिए भी है।
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